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इस अध्याय में जैन दर्शन के अनुसार लोक के भूगोल का वर्णन है !
अधो लोक -
सात पृथिवियाँ (सात नरक)
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रत्नशर्कराबालुकापङ्कधूमतमोमहातमःप्रभाभूमयोघनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाःसप्तोऽधोऽधः ॥१॥
संधि-विच्छेद :
रत्न+शर्करा+बालुका+पङ्क+धूम+तमो+महातमः+प्रभा+भूमय:+घन+अम्बु+वात+आकाश+प्रतिष्ठाः+सप्त+ऽधोऽधः
शब्दार्थ-रत्न-रत्नो,शर्करा-शर्करा,बालुका-बालुका,धूम-धूम,पङ्क-कीचड़,तमअन्धकार,महातम-घोरअन्धकार की प्रभा-कांति के समान सात पृथिवीयाँ है,घनाम्बुवाता-घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय, आकाश-आकाश के, प्रतिष्ठा:-आधार से है !
भावार्थ-
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अधोलोक में.... रत्नप्रभा,शर्कराप्रभा,बालुकाप्रभा,पङ्कप्रभा,धूमप्रभा,तमप्रभा और महात्मप्रभा क्रम से एक के नीचे दूसरी ,दूसरी के नीचे तीसरी ;इस प्रकार सात पृथिवियाँ मे क्रमश: धम्मा ,वंशा ,मेधा, अंजना, अरिष्टा,मधवा और माधवी सात नरक,नारकियों के निवास स्थान ८४लाख बिल है !सभी पृथिवियाँ घनोदधि वातवलय के आधार है,घनोदधि ,घनवातवलय के आधार और घनवातवलय तनुवातवलय के आधार है,तनुवातवलय का आधार आकाश है!आकश सबसे बड़ा और अनन्त है इसलिए स्वयं का आधार है इसका अन्य कोई आधार नहीं है !
सात पृथिवियोँ में नरको(बिलों) की संख्या -
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तासुत्रिंशत्पंचविंशतिपंचदशदशत्रिपंचोनैकनरकशतसहस्राणिपञ्चचैवयथाक्रममम् ॥२॥
संधि विच्छेद -
तासु+त्रिंशत्+पंचविंशति+पंचदश+दश+त्रि+पंचोनैक+नरक+शत+सहस्राणि+पञ्च+च+एव्+यथाक्रममम्
शब्दार्थ-
तासु-उन-पृथिवियों के नरको में, त्रिंशत्-३x१०=तीस ,पंचविंशति-पच्चीस ,पंचदश-पद्रह,दश-दस,त्रि-तीन,पंचोनैक-पांच कम एक लाख,नरक-बिल,शत(सौ),सहस्राणि-(हज़ार)अर्थातलाख पञ्च-पांच,एव +यथाक्रममम् -क्रमश :!
भावार्थ-अधोलोक में उन पृथिवियों;रत्नप्रभा,शर्कराप्रभा,बालुकाप्रभा,पङ्कप्रभा,धूमप्रभा,तमप्रभा और महातम प्रभा में क्रमश ;३०लाख,२५लाख,१५लाख,१०लाख,३ लाख और एक लाख में ५ कम अर्थात ९५००० तथा ५ बिल है !
विशेष -
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१-इस अध्याय में अधोलोक/मध्य लोक का वर्णन है!आकाश और लोकाकाश दो आकाश है!जहाँ तक आकाश द्रव्य में छ द्रव्य व्याप्त है वह लोकाकाश है,वही ३४३ घन रज्जु का हमारा अकृत्रिम,अनादि निधन,स्वभाव से निर्मित लोक है!लोकाकाश,आकाश के बीचोबीच अवस्थित है!इस लोक के तीन अधो,मध्य और उर्ध्व भाग है!अधोलोक में नारकी ,भवनवासी और व्यंतर देवों ,मध्य लोक में व्यंतर,ज्योतिष्क देवों,तिर्यंच और मनुष्य तथा उर्ध्व लोक में वैमानिक देवों का वास है!!मन्दरांचल के नीचे क्षेत्र ,अधो लोक है इसमें सात पृथिवियाँ में सात नरक है!
२- रत्नप्रभा पृथिवि १,८०,००० योजन मोटी है,ये तीन खर,पंक और अब्बहुल भागों में विभक्त है जिनकी मोटाई क्रमश:१६०००,८४००० और १००००० योजन है !खरभाग के प्रथम और अंतिम १००० योजन छोड़कर १४००० योजन में राक्षसों के अतिरिक्त शेष ९ प्रकार के भवनवासी देव और ७ प्रकार के व्यंतर देव रहते है पंक भाग में असुरकुमार और राक्षस रहते है!अब्बहुल भाग में प्रथम धम्मा नरक है,जिसमे ३०००० बिलों,१३ पटल में १०००० वर्ष की जघन्य आयु और १ सागर उत्कृष्ट आयु के बंध के साथ ७ धनुष ३ हाथ ६ अंगुल लम्बे नारकी रहते है !इस पृथ्वी में जीव लगातार ८ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर तीर्थंकर बन सकते है ,असंज्ञी जीव १ कोस उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
३-शर्करा प्रभा पृथिवि मे ,वंशा नरक है, मोटाई ३२००० योजन है,इसके २५ लाख बिलों,११ पटल में ३ सागर उत्कृष्ट और १ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ ५ धनुष २ हाथ और १२ अंगुल लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार ७ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर तीर्थंकर बन सकते है ,सरी सृप जीव २ कोस उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
४ -बालुकाप्रभा पृथिवि में मेधा नरक है,जिस की मोटाई २८००० योजन है,इसके १५ लाख बिलों,९ पटल में ७ सागर उत्कृष्ट और ३ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ ३१ धनुष १ हाथ लम्बे नारकी रहते है जीव लगातार ६ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर तीर्थंकर बन सकते है,पक्षी ३ कोस उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
५-पङ्कप्रभा पृथिवि में अंजना नरक है, जिस की मोटाई २४००० योजन है,इसके १० लाख बिलों ७ पटल में १० सागर उत्कृष्ट और ७ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ ६२ धनुष २ हाथ लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार ५ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर मोक्षगामी हो सकते है ,भुजङ्गादि जीव १ योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
६-धूमप्रभा पृथिवि में अरिष्टा नरक है जिसकी मोटाई २०००० योजन है,इसके ३ लाख बिलों ५ पटल में १७ सागर उत्कृष्ट और १०सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ १२५ धनुष लम्बे नारकी रहते है! जीव लगातार ४ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर मुनि/सकलसंयमी हो सकते है,सिंह जीव २ योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
७-तमप्रभा पृथिवि में मधवा नरक है जिसकी मोटाई १६००० योजन है,इसके ५ कम १ लाख बिलों ३ पटल में २२ सागर उत्कृष्ट और १७ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ २५० धनुष लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार ३ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर देशविरति हो सकते है,स्त्री जीव ३ योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
८-महातमप्रभा पृथिवी में माधवी नरक है जिसकी मोटाई ८००० योजन है,इसके ५ बिलों, १ पटल में ३३ सागर उत्कृष्ट और २२ सागर+१ समय जघन्य आयु बंध के साथ ५०० धनुष लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार २ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर मिथ्यादृष्टिं तिर्यंच हो सकते है, मत्सय एवं पुरुष जीव १०० योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
९-तीनो वातवलय- घनोदधि ,घनवातवलय और घनवातवलय तनुवातवलय लोक के आधार दक्षिण में २००००-२०००० योजन मोटाई है तीनों की मोटाई कुल ६०००० योजन है !सातवे नरक को दोनों तरफ पार्श्व भाग ऊपर मध्य लोक तक ७,५. और ४ योजन क्रम से है अर्थात घनोदधि ७ योजन मोटा,घन ५ और तनु ४ योजन मोटा है !आगे मध्य लोक में दोनों पार्श्व क्रम से ५,४ योजन मोटाई के तीन वातवलय है ,आगे ५ वे ब्रह्म स्वर्ग के दोनों पार्श्व में तीनो क्रमश:७,५,योजन मोटे है!ब्रह्म स्वर्ग से ऊपर जाते हुए लोक अंतिम भाग में दोनों पार्श्व भाग में तीनो वातवलय की क्रमश :५,४ और ३ योजन कुल १२ योजन मोटाई है !लोक के ऊपर शिखर पर चक्र के आकार घनोदधि वातवलय की मोटाई २ कोस =४००० महा धनुष,घन वातवलय १ कोस =२००० महा धनुष वातवलय १५७५ महा धनुष मोटा है !घनोदधि वातवलय गौ मूत्र के रंग समान वर्ण का है!घनवातवलय मूंग के समान रंग और तनुवातवलय अनेक प्रकार के रंगों वाला है !
१० -मध्य लोक से दुसरे नरक की पृथिवीं का अंतराल,दूसरी से तीसरी ,तीसरी से चौथी , पांचवी से छठी ,छठी से सातवी ,प्रत्येक का अंतराल १ राजू से कुछ कम है !सातवी पृथिवि मध्यलोक से ६ राजू के अंतराल पर है!सातवी पृथिवि के नीचे १ राजू प्रमाण कलकल पृथिवि है जिसमे निगोदिया जीव रहते है !लोक में सारे में निगोदिया जीव ठसा ठस भरे है !
११ - नारकी के निवास स्थान को बिल कहते है !ये तीन प्रकार के होते है !
१-इन्द्रकबिल-सभी बिलो के मध्यस्थ के बिल को इन्द्रक बिल कहते है!ये कुल ४९ है!प्रथम नरक का प्रथम इन्द्रक बिल का विस्तार ४५ लाख योजन ढाई द्वीप के समान है और ठीक उसके नीचे है ! क्रम से घटते घटते सातवे नरक का इन्द्रक बिल जम्बूद्वीप के ठीक नीचे १००००० योजन विस्तार का है !
२-श्रेणीबद्धबिल आकाश प्रदेशों की श्रेणी के अनुसार,दिशा और विदिशाओं में स्थित बिल को श्रेणीबद्ध बिल कहते है ये २६०४ है !
३-प्रकीर्णकबिल -पुष्पों के समान बिखरे बिलो को प्रकीर्णक कहते है !८४ लाख में शेष ८३९७३४७ है !
१२ -नरक में नारकी जीवों की विक्रिया -
६ठे नरक तक के नारकियों के त्रिशूल ,तलवार,परशु,आदि अनेक आयुध रूप एकत्व विक्रिया होती है !सातवे नरक में गाय बराबर कीड़े ,चींटी आदि रूप से एकत्व क्रिया होती है !
१३ -नारकियों की लेश्या -रत्नप्रभा में जघन्यकापोत,शर्करा में मध्यमकापोत बालुका में उत्कृष्टकापोत और जघन्यनील,पङ्कप्रभा में माध्यमनील,धूमप्रभा में उत्कृष्यनील और जघन्यकृष्ण,तमप्रभा में मध्यमकृष्ण ,महातमप्रभा में उत्कृष्ट कृष्ण लेश्या है
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